मेरे प्रियजनों,
चलो चले जीवन के मुलभुत और मूलाधार मूल्यों की ओर.......
अपने आप को देखे, कहि हम अपनी जिंदगी को बहोत अधिक गंभीरता से तो नहीं ले रहे है ना? जैसे जैसे समय बीत रहा है, वक़्त की धारा के साथ-साथ क्या आप अधिकाधिक कठोर या जिद्दी (न झुकनेवाले व्यक्ति) तो नहीं बनते जा रहे है ना ?? और अगर बन रहे है, तो क्या यह सही है??
क्या आप अपने जीवन मे डर या भय के कारण, अपने सबसे महत्वपूर्ण अनुभवों से परे तो नहीं है। या तो किसी बाध्यता/बंधन के कारण, या किसी और के भयावह शब्दों की वजह से (जो उनके अनुभवों के कारण बोल रहे है) आप अपने आप को किसी अच्छे अनुभवों से दूर तो नहीं रख आहे है ना ??
क्या आप अपने मन या आदतों के गुलाम बन रहे हैं?? क्या निरंतर स्थगन/विलंबन आपको परेशान कर रहा है और आपको अपने आप से दूर कर रहा है?? क्या आप अपना आत्मसम्मान खो रहे है??
याद रखे की इस पृथ्वी पर आपके पास बहोत ही सिमित/कम समय है और इस समय की गतिको आप समय रह्ते ही समझ ले तो बेहतर है. इससे पहले कि आप पृथ्वी पर से, जिंदगीके इस दृश्य से बाहर निकल जाये. अस्थायी रूप से ही सही आप जायेंगे तो, भले आप पुनर्जन्म मे विस्वास रखते हो परन्तु आप अगर फिर से जिंदगीके नाटक के किसी और पड़ावमे आ भी जाये, तो आपको अपनी पहली भूमिका याद थोड़ी ना रहेगी, जो आपने निभायी थी...
तो फिर गंभीर या दुखी रहने से क्या लाभ?? यही सोचने की तो जरुरत है...की क्रोध, चिंता, भय, घृणा, अनम्यता और असुरक्षा का एहसास क्या इन सब बातोको महत्व देना उचित है??
यही सही समय है कि हमे इस बारे मे सोचना चाहिए.. यही समय है की हमें अपने आप को देखना चाहिए, खुद को गौर करना (मानना) चाहिए, खुद को प्यार करना चाहिए, खुद की परवाह करनी चाहिए...
खुद से पूछो, की कब हम खुलकर दिल से हँसे थे? क्या हम अपना बचपन भूल गए है? क्या वोह आश्चर्यो से भरा हुवा बच्चा कहि खो गया है?? क्या हमने अपनी हँसी खो दी है? आखरी बार कब हमने किसी सुन्दर चीज की दिल से प्रशंशा की थी, कब हमने अपने साथीदार की, बच्चो की तारीफ की थी?? कब हमने आखरी बार हमेशा मन को सताने वाली अपराधी भावना को ईमानदारी से मन से निकाल फेका था??
क्या कभी तुमने अपने आप मे रहना पसंद किया है..?? क्या आपको ऐसा लगता है की आप दुसरोका जीवन नियंत्रित कर सकते हो?? अगर ऐसा आपको लगता है तो पहले अपने आपको, अपने मन को नियंत्रित करके देखो..
क्या आप सेक्स के बारे सोचकर अपराधी महसूस करते है? हाँ? क्यों?? क्या सेक्स जीवन का एक अभिन्न भाग नहीं है?? सेक्स या काम की वृत्ति प्रजतियोंको बनाये रखने के लिए ही जीवोंको प्रदान की गयी है, ये कभी अपने सोचा है क्या?? 'सेक्स' इस विषय को कभी इस तरह से सोचा है?? क्यों इसके बारे मे सोच कर आप अपराधी महसूस करते है?? कभी ये सोचा है की अन्य किसी आदतों की तरह या बन्धनों की तरह अपराधी की भावना इन्सान को बांध लेती है. जागृत विचार और सुलझी हुयी बुध्ही से हमें सारे बन्धनों से मुक्ति मिलती है...
और क्या किसी भी तरह का भय जरुरी है?? क्यों? किस चीज से डरते है आप?? क्या हम अपने आप से डरते है? या समाज, नाम, इज्जत, पैसा, ओहदा इन बातो से डरते है? क्या आपका मन विद्रोह कर रहा है?? किससे विद्रोह कर रहा है? क्या हमारे हाव-भाव हमेशा हमारा अज्ञान और लाचारी प्रकट करते है? क्या हम इससे परे नहीं जा सकते??
क्या हम भोजन और काम/सेक्स को अपना मनोरंजन समझते है, अपनी मुक्तता समझते है?? ...क्या इससे आप को बढ़ावा मिलती है?? मुझे लगता है की हमें जिंदगी के बारे अलग तरीके से, नये ढंग से सोचने की अवशक्यता है, समय किसीके लिए रुकता नहीं है...सोचिये.
क्या हमने कभी धरती माँ के उन बच्चो के बारे मे सोचा है जो निराधार है, उनके लिए हमें कुछ करना चाहिए ऐसा आपको नहीं लगता?? क्या हमने कभी गौर से अपने जीवन को सार्थक बनाने के बारे मे सोचा है? या पशुओं की तरह मजबूर सी आदतों मे बंधे रहने को ही जिंदगी कहते है??
जानो, हम एक बेहोश सी जिंदगी जी रहे है, एक यंत्रवत/मेकानिकल जिंदगी..(घड़ी का काम वाली जिंदगी).
हम अपनी विरासत से मिली हुयी रचना को ही बार-बार यंत्रवत ढंग से दोहरा रहे है और उसपर बहोत अभिमान करते है.. हम दूसरों के शब्दों पर, धन पर शेखी मारते है, झूठा गर्व करते है. हम अपने प्रतिष्ठापर या अपने संस्कारो पर गर्व करते है. क्या यह सही है. किस बात पर हमे इतना गर्व है? ऐसी कोई चीज है जो हमारे जीवन में अस्थायी नहीं है जिसपर गर्व किया जा सके...
यही समय है कि हम दूसरों के बारे मे गलत सोचने से पहले, खुद के बारे में पहले सोचे,. क्या हमारे जिंदगी मे दुःख और पीड़ा का कारण कोई और है? या हमारे ही अन्दर ऐसी कोई बात है जिससे बार-बार हमारा सामना ऐसे लोगों और परिस्थितियों से होता है? क्या है यह, किससे भाग रहे है हम?? यही उचित समय है हमें सावधानी से विचार करने का.
पिछली बार कब हमने ध्यान से अपने सांचो को, पर्तिमानों को बदलने का, तोड़ने का प्रयास किया था? कब हमने अपने आप को अपरिमित/अनंत समझा था, या इसकी संभावना की थी. कब हमने अपने आप को जाना था और अपने आप का फिर से अविष्कार किया था?? ऐसी परिस्थिति जो हमें तंग कर रह रही है उसकी तक्रार ना करते हुए कब हमने उसे अपने अन्दर के विश्वास से, शक्ति से, धैर्य से बदलने का सोचा था ??
क्या कभी हमने ये जाना, ये समझा की हम भी अपरिमित है, एक निर्माण मशीन है जो अपना भाग्य/भविष्य खुद बना सकती है.... कब हमने आखरी बार अपना ध्यान इस बात की ओर दिया की इस शारीर को कौन चला रहा है?? कौन विचारों को प्रेरणा देता है, और हमें विचारोंका, शब्दोका, परिस्थितियों का, घटनाओ का अनुभव कराता है..वोह समय है!!
मुझे लगता है, अपने आप को पूरी तरह से जानने का यही समय है, जब तुम अपने आप को पूरी तरह से जान लो, समझ जाओ, तब दूसरों की तरफ देखना या उन्हें न्याय देना. जब आप ने खुद को ही नहीं समझा तो कैसे आप दूसरों को समझ सकते है..तो फिर क्या जरुरत है उनकी तुलना करने की? हमें कोई हक़ नहीं है किसीको छोटा या बड़ा समझने का या उनसे घृणा करने का...किसीसे भी नहीं पशुओसे भी नहीं....
मुझे पता है की जिंदगी मे हम किसी ना किसी बात के लिए असंतुष्ट रह्ते है, नाखुश रह्ते है, कभी हम दूसरों के लिए भी खुश नहीं होते..हम हमेशा बस तक्रार ही करते है...क्योकि हम हमेशा दूसरों से तुलना करते है... कब हमने अपने दोषों की तुलना मे अपनी योग्यता को जादा महत्व दिया है? कब हमने कृतज्ञता से यह जाना है, ये समझा है की हमारे शारीर के महत्वपूर्ण कार्य जैसे की - पाचन, स्वसन, ह्रदय का स्पंदन, रक्ताभिसरण, ग्रंथियों से रस स्त्राव ये सारे काम हम अपने चेतन मन से नियंत्रित नहीं कर सकते है. क्या हमने ये सोचा है की इन बातोंपर हमारा नियंत्रण नहीं चलता, तो हम अपने शारीर को नाम क्यों रखते है, क्यों अपशाब्दोका प्रयोग करते है??यही समय है सोचने का की क्या हमें अपने शरीर को दुर्वचन कहना चाहिए??
क्या कभी हमने पुरे आदर भाव से ये सोचा है की हमारा शारीर कितना अनमोल है.?
वैसे ही कभी आपने मांस खाने से पहले यह सोचा है की ये जिन्दा शरीर जो किसी पक्षिका होगा, या पशुका जो आपके जिव्हा की संतुष्टि के लिए बलिदान दे रहा है??
पिछली बार कब आपने अपने मन की कैद से बहार निकल के निश्चय लिया था, की कोई भी महत्व पूर्ण काम मै कभी भी स्थगित नहीं करुँगा..
कब आपने अपने वादे निभाए है, तुम्हे किसी और को कुछ बताना नहीं है बस अपने अंतकरण/अंतर्मन को ही उत्तर देना है, अपने अंतःकरण को ही समझना है.
कब पिछली बार हमने हमारे पैटर्नस तोड़ दिये थे जो हर बात को विलंबित करते रह्ते है? कब पिछली बार तुमने ये सोचा था की मेरा खुद का मन ही मेरी प्रगति को रोक रहा है और किसीको भी मै इस बात के लिए जिम्म्मेदार नहीं ठहरा सकता. कब पिछली बार हमने अपने आप पर विस्वास किया था और अपने विचारो पर हमने एक्शन लिया था ना की दूसरोंके शब्दों पर.
कब पिछली बार तुमने अपने खुद के अनुभवों पर यकीन किया था और खुद उसपे गर्व किया था नाकि दुसरों प्रशस्ति पाकर.
क्यों हम अपने सिमित, आरामदायी सीमा रेखा से बाहर नहीं निकलना चाहते, क्यों?? क्या पूरी दुनिया आपका अपना क्षेत्र नहीं है ? क्यों हम अपने आपको एक ही जगह पे बंद रखना चाहते है, सिमित करना क्स्हहते है?? क्या हम अपने भय से सामना करनेसे डरते है? क्या खोएंगे आप, मृत्यु तो सबके लिए निश्चित है. अपने ही यशस्वी जीवन के मार्ग पर आप खुद ही बाधा बन रहे है. सोचये क्या यह आपका अहंकार तो नहीं है जो आपके यश के मार्ग मे बाधा बन रहा है.
क्यों हम निराश होते है? क्यों हम उदास होते है?? क्यों हम गुस्सा होते है, क्यों हम दुसरोसे और अपने आप से द्वेष, घृणा करते है? क्यों हम झूठ बोलते है, दूसरों को धोका देते है और अपने अंतकरण/अंतर्मन को दूषित करते है.
क्यों हम अपने आप को बहोत असहाय समझते है, क्या आप यह विस्वास नहीं करते या महसूस नहीं करते की तुम्हारा अन्तरमन ही तुम्हारे भगवान का मंदिर है?? यही समय है यह मानने का, जताने का..क्या हम अपने भगवान का मंदिर हमारा अंतर्मन गन्दा या दूषित कर सकते है जहा वो रहता है.....
क्या आपने कभी अपने भनवान या गुरु से यह पूछा है की "मै आपके लिए क्या कर सकता हूँ भगवान?" ना की "आप मुझे क्या देने वाले है भगवन" जब की सच्चे गुरु और भगवान को आपसे कुछ भी नहीं चाहिए होता है.
कब आपने आखरी बार सच्चाई से यह कहा था की मै खुश हूँ, कब आपने अपने दिखावा छोड़कर जो आप है उसीको स्वीकारा था?? कब आपने आखरी बार आपने आप को अपने कर्मो से मुक्त किया था, और ईमानदारी से कर्म करके सच्चाई से कहा था की "हे प्रभु जैसी आपकी इच्छा हो वैसेही होने दो" साथ ही साथ जो भी नतीजा निकले जिंदगी का, उसको बिना किसी प्रतिरोध से क्या हमने स्वीकार किया था.
आपने कभी अपने आपको आईने मे देखकर कहा है की 'मै तुमसे बहोत प्यार करता हूँ, तुम बहोत ही अद्भुत हो" कभी आपने सुबह उठ कर जिन्दा होने पर शुक्रिया अदा किया है? कभी आपने धरती माता को छूकर उसका तहे दिल से शुक्रिया अदा किया है? कभी आपने अपने घर के पौधोंके के पत्तो को छूकर कहा है की मै आप से प्यार करता हूँ, बहोत ही करीबी रिश्ता है हमारा....
क्या कभी आपने अपने नकारात्मक सोच को निकलकर फेंक दिया और आशावदी होकर अपने आपको प्यार और उत्साह से भर दिया है.
क्या कभी आपने आपने गुरु, भगवान की आँखों मे देखकर कहा है की, 'मै आपसे अलग नहीं हूँ, हम एक ही है" कब आपने आखरी बार ईमानदारी को गले से लगाया है??
कभी आपने ये सोचा है की यह शारीर और कितने साल इस धरती पर चलने वाला है, मेरे आजू बाजु के लोग भी कभी ना कभी तो नष्ट होने ही वाले है.
अभी यही समय है पुरे दिल से, पूरी सच्चाई से आभारी होने का, बिना किसी शर्त के बिना किसी उद्देश से प्यार करने का, प्यार जताने का...
क्या आपने कभी यह सोचा है की आप खाली हाथ आये थे और खाली हाथ जायेंगे...कभी यह सोचा की आपकी जरुरत क्या है..खाना, कपडा और माकन..और क्या जरुरत है आपकी? क्या स्थाई है कुछ भी नहीं.. हमारा अपना ऐसा कुछ भी नहीं है सब कुछ आया है और ऐसे ही चला जायेगा..
जानो की यह समय है, बस समय... और यह समय भी चला जायेगा, मेरा अपना कुछ भी नहीं है..मेरा जो कुछ है वोह मै तुम्हे सौपता हूँ, मै आपने लिए कुछ भी नहीं रखूँगा, मै एक तरल पदार्थ हूँ जो उस शुध्ह चेतना का मूल है जहा पर आप है, मेरा पूरा प्यार आपके लिए है, मै आपको अपने मे ही आलिंगन देता हूँ..मै दिखता नहीं हूँ, मै ही आप हो....मै अपने स्वयं से बहोत प्यार करत हूँ और मेरा स्वयं ही आप है ...."
अनंत प्यार
गुरु